भारत में व्यंग्यचित्र यानि कार्टून की परम्परा बहुत पुरानी रही है। हर काल में व्यंग्य अपना स्वरूप बदलकर आता रहा है। कभी, ‘कबीर दास की उल्टी बानी, बरसे कंबल भींगे पानी, कहने वाले कबीर के रूप में, कभी ‘जिस दिशा में खुदा न हो, मेरे पैर घुमाकर उधर रख दो’ कहने वाले नानक के रूप में। ‘राम चरित मानस’ में देवर्षि नारद के तप से आंतकित देवराज इन्द्र का एक प्रसंग है। गोस्वामी तुलसीदास इन्द्र की पद-लोलुपता पर तीखा व्यंग्य प्रहार करते हुए कहते हैं–
सूख हाड लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।
छीनि लेई जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज॥
अर्थात् सूखी हड्डी चबाता हुआ कुत्ता शेर को देखकर भयभीत हो जाता है कि कहीं शेर इस हड्डी को मुझसे छीन न ले। कबीर, सूर, तुलसी, नानक और दक्षिण में तिरुवल्लुवर और वेमन्ना जैसी अनेक विभूतियाँ तत्कालीन धार्मिक व सामाजिक व कुरीतियों पर सहजता से जो चोट कर गयीं, वह पूरी दुनिया में आज भी सामयिक है। हमारे यहाँ तो उनके कालजयी व्यंग्य के लिए उन्हें सदियों से पूजा जाता है, क्योंकि हम काफी पहले समझ चुके हैं कि धर्म, व्यंग्य नहीं होता। व्यंग्य का मर्म धर्म होता है। इन महापुरुषों के व्यंग्य के मर्म को धर्म मानकर हम पूजते हैं, जिसकी अमिट छाप हमारे जीवन, संस्कृति, लोकाचार और साहित्य पर पड़ी है। इसके बिना वर्त्तमान व्यंग्य की कल्पना नहीं की जा सकती।
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