काव्य में जीवन और जीवन में काव्य की तलाश के अभ्यस्त डॉ. सत्येन्द्र शर्मा की पहली ही समालोचना कृति ‘नवगीत : संवेदना और शिल्प’ (1993) को हिन्दी संसार में व्यापक स्वीकृति मिली। आत्रेय हिन्दी संस्थान, मेरठ और डॉ. शंभुनाथ सिंह न्यास वाराणसी का सम्मान (1995) भी इसे प्राप्त हुआ। संभवतः इसका श्रेय लेखक की उस ताज़ा धुली हुई दृष्टि को है जो दक्षिण-वाम की लीक से अलग अपनी सांस्कृतिक काव्य-परम्परा, परिवेश, प्रकृति और पारिस्थितिकी के अनुरूप काव्य का प्रशस्त अवगाहन और आग्रह करती आई है।
लेखक की पिछले दिनों प्रकाशित ‘जाओ रानी याद रखेंगे’ सुभद्राकुमारी चौहान की अमर रचना ‘झाँसी की रानी’ को केन्द्रित कर काव्य को लोक और इतिहास के आईने में जिस तरह परखा गया है तथा उसे मानव – मूल्य, सामाजिक प्रतिबद्धता और कवि कर्म की प्रामाणिकता को पाने के लिए जिस राष्ट्र बोध, लोकजीवन, ग्राम्य संस्कृति, प्रकृति संरक्षण, स्वदेशी चेतना और सुराज भाव आदि को मानदण्ड बनाया गया है; यह चिन्तन विस्मयपूर्वक भारतीय काव्य-मनीषा का पुनर्स्मरण तो कराता ही है; लेखक के कविता में रमने के संस्कारों का साक्ष्य भी देता है। ‘कविता की आँच’, ‘संवेदना के सेतु’, ‘आधुनिक मूल्य’, ‘कविवर गोपालशरण सिंह’, ‘केशवप्रसाद पाठक’ आदि कृतियों तथा ‘मानवमूल्य – परक शब्दावली विश्वकोश’ के सहभागी लेखन और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके समसामयिक स्वतंत्र आलेखों में समीक्षा की यह रचनात्मक चेतना निरन्तर विद्यमान है, जो इस ऐतिहासिक काव्यकृति – ‘सुदामा चरित्र’ के सह-सम्पादन में भी देखी और पहचानी जा सकती है।
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