Galo Lok Kathaon Mei Stri / गालो लोककथाओं में स्‍त्री

250.00

Language: Hindi
Book Dimension: 5.5″x8.5″

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अनुक्रम

  • अरुणाचल प्रदेश की गालो जनजाति और उसका लोकसाहित्य
    • अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों में गालो जनजाति की स्थिति
    • लोकसाहित्य का सामान्य परिचय
    • गालो लोकसाहित्य का सामान्य परिचय
    • गालो समाज में स्‍त्री की स्थिति : अतीत एवं वर्तमान
  • गालो लोककथाएँ एवं स्‍त्री
    • गालो लोककथाओं में सम्प्राप्त स्‍त्री-विषयक सामाजिक द‍ृष्‍टि
    • गालो लोककथाएँ एवं स्‍त्री-जीवन : विविध रूप एवं आयाम
    • गालो लोककथाओं में स्‍त्री सम्बन्धी वर्जनाएँ एवं प्रतिबंध
    • गालो लोककथाओं में स्‍त्री-प्रतिरोध के स्वर
    • गालो लोककथाओं में स्‍त्री-बुद्धिमत्ता
  • 3. गालो लोकगाथाएँ एवं स्‍त्री
    • प्रस्तावना
    • गालो लोकगाथाओं से सम्बन्धित नृत्यों में स्‍त्री की भूमिका
    • गालो लोकगाथाओं में स्‍त्री-सम्बन्धी मिथक
    • मिथक के प्रकार
    • गालो लोकगाथाओं में वर्णित समाज में स्‍त्री की स्थिति
    • लोकगाथाएँ एवं स्‍त्री का लौकिक-अलौकिक रूप
    • लोकगाथाओं में अभिव्यक्त स्‍त्री-सम्बन्धी सामाजिक द‍ृष्‍टि
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Description

पुस्तक के बारे में

गालो लोककथाओं में जिमी आनअ का संसार की सृष्‍टिकर्ता ही नहीं बल्कि पुरुषों की मार्गदर्शिका के रूप में भी वर्णन किया गया है। मोपीन आनअ के द्वारा आबोतानी को अनाज के बीज आदि दिलाकर पृथ्वी पर कृषि-कार्य की शुरुआत करवाने के लिए उन्हें अन्‍नपूर्णा देवी का अवतार माना गया है। इन लोककथाओं के द्वारा यह बताया गया है दियी तामी देवी अपनी बुद्धिमती एवं सूझबूझ के द्वारा आबोतानी का फक्‍कड़पन छुड़वाकर उन्हें एक कृषक के रूप में स्थापित करने के लिए कृषि-कार्य से जुड़ी तमाम गुर सिखाती हैं और उनके रास्ते में आने वाली विभिन्‍न विपदाओं से भी बचाती हैं। इन लोककथाओं में चित्रित स्‍त्रियों में हर तरह की लौकिक एवं अलौकिक शक्तियाँ होती हैं जिनसे वे अपनी सुख-सुविधा की हर प्रकार की चीज़ें जुटा सकती हैं। मगर इसके बावजूद भी उनमें ज़रा-सा भी घमंड और अहंकार नहीं होता, वे अपनी तमाम शक्तियों का प्रयोग मानवता के मंगलकारी कार्यों के लिए ही इस्तेमाल करती हैं। स्वभाव से मनमौजी एवं मस्त-मौला आबोतानी ने अनगिनत विवाह किये थे; आज गालो समाज में बहुपत्‍निवाद का जो प्रचलन है यह गालो जनजाति की मान्यतानुसार उन्हीं की देन है। उन्होंने पेजेक पक्षी, मेढक, कोसुक (सूखी पत्तियाँ), ओञोर, दोञि मुम्सी, दियी तामी, रोसी तामी आदि जिनसे भी उन्होंने विवाह किया उन सभी पत्‍नियों ने उनकी सेवा-सुश्रूषा में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन पत्‍नियों से सबकुछ हासिल कर के भी आबोतानी की पुरुष-वृत्ति संतुष्‍ट नहीं हुई, वह एक के बाद एक नई पत्‍नी लिवा लाते और उसे त्याग देते थे। अन्त में वह मोपीन देवी की पुत्री दियी तामी को ब्याह लाते हैं। दियी तामी जिसे लक्ष्मी का अवतार माना जाता हैं वह विवाह के बाद अपने साथ बहुत कुछ ले आती है जिसके द्वारा वह आबोतानी का घर-परिवार को आबाद करती हैं। दोनों नवविवाहित जोड़ी अत्यन्त ही समृद्ध और खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगते हैं। एक समय बेघर और ख़ानाबदोश ज़िन्दगी व्यतीत करने वाले आबोतानी के पास अब सबकुछ होता है। उनके घर-आँगन में कई सारी मिथुन, सूअर, गाय, मुर्गियाँ विचरण करती हुई होती हैं, उनके खेत फसलों से लहलहा रहे होते हैं और नासू अर्थात् गोदाम सदा अनाजों से भरा हुआ होता है। मगर अपनी आदत से मजबूर आबोतानी का चंचल मन स्थिर नहीं रहता और इस बार उसका मन एक और स्‍त्री रोसी-तामी जो कि दिरो (दरिद्र) महाराज की पुत्री है उस पर आ जाता है। और यहीं से उसकी बर्बादी की कहानी का आरम्भ हो जाता है। जब वह उसे ब्याह कर अपने घर ले आते हैं तो उसके साथ उसका कुत्ता दिर्र-कीबो (दरिद्र–कुत्ता) भी चला आता है। सौत के आने से नाराज़ होकर आबोतानी की पत्‍नी दियी-तामी आबोतानी को त्यागकर अपनी माँ के पास आम्पिर दोलू लौट जाती है। यहीं से आबोतानी की गरीबी और बदहाली के दिन फिर से शुरू हो जाते हैं। गालो बुजुर्गों का यह मानना है कि आबोतानी की इन्हीं गलतियों के कारण आज इस धरती पर दरिद्रता, गरीबी और भुखमरी होती है। गालो लोगों की यह मान्यता है कि आबोतानी ने इस तरह से बहुपत्‍निवाद को बढ़ावा दिया जिसके कारण आज भी गालो समाज में इसका प्रचलन है। गालो लोककथाओं के अनुसार आबोतानी के जीवन में जितनी भी स्‍त्री पात्र आयीं सभी गुणवती, सच्चरित्र, सुशील, मंगलकारी और आदर्श स्‍त्रियों की सर्वोत्तम मिसाल थीं, मगर इसके बावजूद भी उन्हें अपनी विशेषताओं पर बिलकुल भी घमंड नहीं थीं। वे जब तक आबोतानी के साथ थी पूरी तरह से समर्पित पत्‍नी बनकर उनकी सेवा करती रही मगर फिर भी आबोतानी नहीं सुधरे। उनकी पत्‍नियाँ आदर्श पत्‍नी की प्रतिमूर्ति बनकर सदा उनकी सेवा में जुटी रहती थी। मगर अपनी चंचल पुरुष वृत्ति के कारण आबोतानी का अपनी पत्‍नियों से बहुत जल्द जी भर जाता था। उन्होंने कई विवाह किये, वह एक के बाद एक करके जितनी जल्दी नई पत्‍नी ब्याह लाते उतनी ही जल्दी उन्हें त्याग भी देते थे। आबोतानी की पत्‍नियाँ उनके सभी दुर्व्यवहार सहती रहीं पर नारी सुलभ सहनशीलता, सौम्यता एवं कोमल भावनाओं के कारण उनसे प्रेम करती रहीं और सदा उनको उत्कर्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहीं। धरती की तरह सहनशील और शान्त ये स्‍त्रियाँ, आबोतानी से कभी नहीं लड़ीं और सदा अपनी गरिमा एवं गौरव को बनाये रखा। गालो लोककथाओं में स्‍त्री के विविध रूपों एवं आयामों का वर्णन उपलब्ध है। इन लोककथाओं में रोचकता, नीति एवं आदर्श की शिक्षा एवं मनोरंजन के साथ गालो जनजातीय जीवन की प्राचीनकाल के इतिहास और उससे सम्बन्धित स्‍त्री-जीवन से जुड़ी कई महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ भी समाहित हैं साथ ही गालो जनजातीय जीवन में स्‍त्री के महत्त्व, सृष्‍टि की उत्पत्ति में जिमी आनअ के रूप में स्‍त्री की महत्त्वपूर्ण भूमिका, मनुष्य की धरती पर कृषि-कार्य के प्रारम्भ में मोपीन आनअ के रूप में स्‍त्री की भूमिका, स्‍त्री के अदम्य साहस एवं वीरता, बहन के प्रति बहन का असीम प्रेम, माता, पत्‍नी, बहन आदि के रूप में पुरुष की मार्गदर्शिका बनी स्‍त्री के रूपों एवं आयामों का वर्णन उपलब्ध है।

…इसी पुस्तक से…

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